Thursday, 12 April 2012

उपन्यास का ग्यारहवा पन्ना!

सोचने,सोचने में ही कहीं...समय न निकल जाए!



                                    ( फोटो गूगल से साभार ली है)

कहते है कि...हर काम सोच-समझ कर ही करना चाहिए!...वरना लेने के देने पड़ जाते है!....यह उपदेश कैसा लगा आपको?...मुझे तो सही जान पड़ता है...लेकिन...

....यह उपदेश ग्रहण करने में कुछ दिक्कतें आ रही है!....उपदेश प्रचारित करने वाले ने इसके लिए समय की मर्यादा पेश की नहीं है!...किसी काम को करने या ना करने  का निर्णय लेने में कितना समय व्यय करना चाहिए...इसकी शिक्षा हमें कोई नहीं दे रहा!...यह तो स्वयं ही तय करना है!

...सुधीर को मुंबई से बहुत अच्छे जॉब का ऑफर आया है !...वह अच्छे जॉब की तलाश में भी है!...ऐसे में वह सोचने लगा कि 'मुंबई वाला जॉब अच्छा तो है लेकिन मुझे इससे अच्छा जॉब मिल सकता है...मेरी योग्यता तो बहुत ज्यादा है!....तो मुझे क्या करना चाहिए...'हाँ' या 'ना'?'

...सुधीर अपने घरवालों के साथ मशवरा करता है!...कोई 'हाँ' कह रहा है...तो कोई कह रहा है 'इंतज़ार कर!..तुझे इससे बेहतर जॉब मिल सकता है!'

...सुधीर अपने दोस्तों से पूछ रहा है....यहाँ भी सभी की राय अलग अलग है!....सुधीर सभी की राय लेता हुआ आखिर इस नतीजे पर पहुँच जाता है कि फिलहाल यह जॉब ज्वाइन कर लेना चाहिए!

.....लेकिन जब वह अपनी स्वीकृति भेज देता है....समय अपनी गति से आगे बढ़ चुका होता है...और सुधीर को अब जवाब मिलता है' सौरी!...आपने देर कर दी....हमें इस जॉब के लिए लायक उम्मीदवार मिल चुका है!'...और सुधीर को सिर पकड़कर बैठना पड़ जाता है!....बहुत ज्यादा सोचने की कीमत उसे चुकानी पड़ती है!

....ऐसा सुधीर के साथ ही नहीं...बहुतों के साथ होता है!...कई मामलों में निर्णय लेने में देरी लगाने से, हाथ मल कर बैठ जाना पड़ता है!

....सोचने, सोचने में इतनी देर न लगाएं कि मौक़ा हाथ से  निकल जाए!....मौक़ा निकल जाने के बाद पता चलता है कि 'कितना सुनहरी मौक़ा था!'

.....शादी के मामलों में कई लड़के औए लडकियां अच्छा जीवनसाथी पाने से सिर्फ इसी वजह से वंचित रह गए कि....सोचने सोचने में ही उन्होंने बहुत समय व्यर्थ किया!...जब बहुत समय बाद ये लोग किसी निर्णय तक पहुंचें....उनका साथी किसी और का दामन थाम चुका था!

.....सोच-समझ कर काम करना या निर्णय लेना अच्छी बात है....लेकिन समय का ध्यान अवश्य रखें...समय आपका ध्यान नहीं रखेगा!

...'कोकिला...' उपन्यास आगे बढ़ रहा है....समय के साथ ही चल रहा है!
लिंक देखिए..... 
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/mujhekuchhkehnahai/entry/11-%E0%A4%95-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%9C-%E0%A4%AC%E0%A4%A8-%E0%A4%97%E0%A4%88-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%A8-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8-%E0%A4%AF-%E0%A4%B8

11 comments:

veerubhai said...

कथानक को लेखिका ने बड़े कसके बांधा है .भाव विरेचन की दृष्टि से कोई शब्द फ़ालतू नहीं .एक अन्दर करेंट उपन्यास में चल रहा है .हंसमुख मौके की तलाश में वासना का ज्वार उबाला ले रहा है .कोकिला की भाव भूमि दूसरी है वह मदन सिंह के करेक्टर को भरसक बचाना चाहती यह कहकर हम दोनों ही समझदार थे बालिग़ थे जो हुआ होशोहवास में हुआ .

मदन सिंह का भाव जगत अगले अंक में मुखरित होगा अभी हमारे लिए अनुमेय ही है .

kshama said...

Utsukta badhati ja rahee hai!

Arvind Mishra said...

यह तो एक लम्बा अनुष्ठान लगता है -उपन्यासों की कमी है आजकल ..अच्छी बात !शुभकामनाएं!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह वाह क्या बात है! बधाई

उल्फ़त का असर देखेंगे!

मनोज कुमार said...

रोचकता बरकरार है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत उपयोगी सिक्षा दी है आपने!
समय का ध्यान हर किसी को रखना चाहिए,
क्योंकि समय किसी का ध्यान नहीं रखता है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सर्वप्रथम बैशाखी की शुभकामनाएँ और जलियाँवाला बाग के शहीदों को नमन!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
सूचनार्थ!

veerubhai said...

..लेकिन जब वह अपनी स्वीकृति भेज देता है....समय अपनी गति से आगे बढ़ चुका होता है...और सुधीर को अब जवाब मिलता है' सौरी!...आपने देर कर दी....हमें इस जॉब के लिए लायक उम्मीदवार मिल चुका है!'...और सुधीर को सिर पकड़कर बैठना पड़ जाता है!....बहुत ज्यादा सोचने की कीमत उसे चुकानी पड़ती है!
बहुत सुन्दर व्याख्या .भूमिका भाग का उपन्यास से अलग हटके एक अलग सौन्दर्य है यह बात खुलकर सामने आ रही है .

veerubhai said...

..लेकिन जब वह अपनी स्वीकृति भेज देता है....समय अपनी गति से आगे बढ़ चुका होता है...और सुधीर को अब जवाब मिलता है' सौरी!...आपने देर कर दी....हमें इस जॉब के लिए लायक उम्मीदवार मिल चुका है!'...और सुधीर को सिर पकड़कर बैठना पड़ जाता है!....बहुत ज्यादा सोचने की कीमत उसे चुकानी पड़ती है!
बहुत सुन्दर व्याख्या .भूमिका भाग का उपन्यास से अलग हटके एक अलग सौन्दर्य है यह बात खुलकर सामने आ रही है .

रविकर फैजाबादी said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति |
बधाईयाँ ||

Amrita Tanmay said...

सुन्दर कथा..