जब अनुभव देता है शिक्षा....
किसीसे कुछ भी लेने का हक नहीं है तुम्हे...
..अगर लौटा नहीं सकते तुम!
चंद घडिया खुशियों की भी क्यों ली तुमने किसीसे?
जब उन्हे लौटाने के काबिल नहीं हो तुम!
आंसू किसी के कोई नहीं ले सकता...
उन्हे बहते हुए देख सकते हो..दूर या पास रहकर...
...तो फिर अपनेपन का ये कैसा एहसास...
..जब अपनापन जताने के काबिल नहीं हो तुम!
शर्मिन्दा होना पड्ता है तुम्हे!
जब बारी आती है किसी से कुछ लिया...
प्रेम सहित वापस लौटाने की...
..और लौटाने के काबिल..तब नहीं होते तुम!
मजबूरियां तो होती है हर किसी के पास, हर घडी!
..ये जान कर भी अनजान बनना आखिर किसलिए?
जानते हो कि कुछ दे नहीं सकते बदले में तो....
कुछ लेने के काबिल खुद को क्यों समझते हो तुम?
...जब अनुभव देता है शिक्षा,
उसे ग्रहण करते जाना है तुम्हे...
..क्यों कि अनुभव से ही जीवन को
सुखमय बना सकते हो तुम!
नोट- यह कविता मैंने अपने आप को संबोधित करके लिखी है! ....किसी पर कोई कटाक्ष नहीहै!
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Thursday, 18 February 2010
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