Monday, 23 April 2012

उपन्यास का सत्रहवां पन्ना!

हवा के साथ साथ....

पन्ने पलट्तें जा रहे है! 
तेज झोंके हवा के आ आ कर...
मेज पर पडी मेरी डायरी को
जोर जोर से हिला-डुला कर...
अपने संग कहीं दूर तक उड़ा कर....
ले जाने की कोशिश में है....
पर डायरी नहीं छोड़ रही अपनी जगह....
सिर्फ पन्ने पलटतें जा रहे है....

डायरी में लिखा हुआ है...
एक एक दिन का कारनामा...
किस से हुआ मिलना..
और किस से हुआ बिछडना...
किसी से किया हुआ वादा...
जब निभाया न गया....
तब और होना भी क्या था...
अच्छा ख़ासा मनमुटाव हुआ...
लिखा हुआ है आगे कि...
वे  नजरें फेर कर जा रहे है....
और पन्ने पलटतें जा रहे है!

हवाने कुछ जोर और लगाया....
अचानक से बीस पन्ने....
फडफडाहट के साथ पलट गए....
बहुत कुछ बदल गया था....
मेरे होठ कोई प्यारा सा गीत...
यूंही मस्ती में गुन -गुना रहे थे....
गीतों के बोल साफ़ नजर आ रहे है...
लेकिन पन्ने तो पलटतें जा रहे है!

पता नहीं ये कविता कैसी बन पडी है...लेकिन उपन्यास की कहानी बीस साल आगे निकल गई है!...किसी भी तरह की कोई बोरियत दिए बगैर....लिंक देखिए....


http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/mujhekuchhkehnahai/entry/17-%E0%A4%95-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%9C-%E0%A4%AC%E0%A4%A8-%E0%A4%97%E0%A4%88-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%A8-%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8-%E0%A4%AF-%E0%A4%B8

3 comments:

मनोज कुमार said...

रोचक!

vijay kumar sappatti said...

अच्छा लगा, और अब रोज एक पन्ना पढूंगा . धन्यवाद. जी

Laila Thakur said...

Excellent Article!!! I like the helpful information you provide in your article.