Thursday, 22 March 2012

उपन्यास का चौथा पन्ना.....




उपन्यास का चौथा पन्ना.....

कोकिला के पति हसमुख जी....
न जाने क्यों परेशान है...
डॉ. तेजेन्द्र की बे-सिर पैर की...
बातों से हैरान है....
वैसे तो ये है गुजराती रसिया...
मोटे सेठ है...धनवान है!
कोकिला की चिंता भी इन्हें है....
न जाने क्यों...वह अब तक जवान है!
उससे प्यार भी करते है....
टूट के चाहते है उसे.....
उनके लिए तो वह जान है!
पर विश्वास नहीं ये करते किसी पर....
पत्नी हो या...हो ड्राइवर....
बेचारे शक्की है....नादान है!
जवान बेटा भावेश भी ...
नालायक है इनके लिए....
जैसे कि दुनिया में इनके जैसा कोई नहीं...
यही अकेले....पहुंचे हुए...महान है!
नीचे दिए गए लिंक पर चले जाइए....
हर तीसरे दिन खुलेगा नया पन्ना....
उपन्यास दिया जा रहा है यहाँ....
शौक से पढते जाइए...
यह काम बहुत ही आसान है!


9 comments:

virendra sharma said...

दिलचस्पी पैदा करती प्रस्तुति उपन्यास को पढने के लिए उकसाती सी .आभार .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

अब तो उपन्यास पढ़ने की चाह जग गई है!

virendra sharma said...

इस उपन्यास के शीर्षक से लगता है मानो इसके मुख पृष्ठ पे लिखा हो स्वागतम .माननीया आपकी द्रुत टिपण्णी लेखन की आंच बन आती है .शुक्रिया .

मनोज कुमार said...

लाजवाब!

Dr. sandhya tiwari said...

bahut sundar sanyojan

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति,बेहतरीन सटीक रचना,......

my resent post


काव्यान्जलि ...: अभिनन्दन पत्र............ ५० वीं पोस्ट.

SM said...

the book looks good and very interesting

मुकेश कुमार सिन्हा said...

padhna hi parega........:)

virendra sharma said...

दिलचस्प .आभार ब्लॉग विज़िट के लिए .